SC-ST आरक्षित सीटों पर हर चुनाव में रोटेशन की मांग खारिज! सुप्रीम कोर्ट ने कहा- ‘संसद का काम हम नहीं कर सकते’

नई दिल्ली: लोकसभा और विधानसभा की अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों पर हर चुनाव में रोटेशन लागू करने की मांग को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण और उनमें बदलाव करना संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है। न्यायपालिका विधायिका को इस संबंध में नया कानून बनाने या मौजूदा कानून में बदलाव करने का निर्देश नहीं दे सकती।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने कहा कि इस मामले में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है। अदालत ने याचिकाकर्ता को सलाह दी कि वह अपनी मांग निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के सामने रखें और कानून में बदलाव के लिए समर्थन जुटाएं।

करीब सात दशक से आरक्षित कादीपुर सीट पर उठाया सवाल

यह मामला उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले की 191-कादीपुर विधानसभा सीट से जुड़ा है। याचिकाकर्ता जगदीश सिंह इसी क्षेत्र के मतदाता हैं। उनका कहना था कि कादीपुर सीट के गठन के बाद से करीब सात दशक से यह अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है।

याचिकाकर्ता ने दलील दी कि किसी सीट को लगातार आरक्षित रखने और वहां रोटेशन की व्यवस्था नहीं होने से संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 19 का उल्लंघन होता है। उनका तर्क था कि इससे मतदाताओं के पास केवल अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों में से प्रतिनिधि चुनने का विकल्प रह जाता है। साथ ही, आरक्षण का लाभ व्यापक समुदाय के बजाय कुछ परिवारों तक सीमित हो सकता है।

उन्होंने मांग की थी कि पंचायतों और नगर निकायों की तरह लोकसभा और विधानसभा की आरक्षित सीटों पर भी रोटेशन की व्यवस्था लागू की जाए।

परिसीमन अधिनियम की धारा 9(1)(c) को दी थी चुनौती

याचिकाकर्ता ने परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(c) को चुनौती दी थी। इस प्रावधान के तहत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण उन इलाकों में किया जाता है, जहां इन समुदायों की आबादी का अनुपात तुलनात्मक रूप से अधिक होता है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस प्रावधान को वैध ठहराते हुए आरक्षित सीटों के रोटेशन का निर्देश देने से इनकार कर दिया था। इसके बाद याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। शीर्ष अदालत ने भी हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

‘गलत नंबर मिला दिया है’, CJI ने संसद जाने की दी सलाह

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता से कहा कि उन्होंने गलत नंबर मिला दिया है। रोटेशन की मांग संसद के सामने उठाई जानी चाहिए।

सीजेआई ने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि यह विरोध प्रदर्शन और नारेबाजी का अच्छा समय है। उन्होंने याचिकाकर्ता को सलाह दी कि वह जनप्रतिनिधियों से संपर्क करें और कानून में बदलाव के लिए समर्थन जुटाएं।

अदालत ने अपने आदेश में भी कहा कि याचिकाकर्ता सार्वजनिक प्रतिनिधियों के सामने अपनी मांग रखकर रोटेशन का सिद्धांत लागू करने के लिए सहमति बनाने का प्रयास कर सकते हैं।

जाति के बजाय राजनीतिक विचारधारा के आधार पर मतदान की उम्मीद

सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि बहुदलीय लोकतंत्र में मतदाताओं से अपेक्षा की जाती है कि वे जाति या धर्म के बजाय राजनीतिक दलों और उनकी विचारधारा के आधार पर मतदान करें।

उन्होंने कहा कि किसी निर्वाचन क्षेत्र में अनुसूचित जाति की आबादी अधिक होने के कारण वहां सीट आरक्षित रखने से जातिगत विभाजन पैदा होता है या नहीं, यह विधायिका के विचार करने का विषय है। केवल इस आधार पर संबंधित कानून को असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता।

जस्टिस बागची ने यह भी कहा कि किसी समुदाय की आबादी अधिक होने का मतलब यह नहीं है कि वहां के मतदाता केवल अपनी जाति या समुदाय के उम्मीदवार को ही वोट देंगे। मतदाताओं की पसंद का फैसला अदालत नहीं कर सकती।

चुनाव लड़ने और वोट देने के अधिकार में अंतर

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान मतदान के संवैधानिक अधिकार और किसी खास निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने के दावे के बीच अंतर भी स्पष्ट किया। अदालत ने कहा कि सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों के पास गैर-आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव लड़ने का विकल्प मौजूद है। इसलिए किसी विशेष आरक्षित सीट से चुनाव लड़ने के अधिकार को मतदान के अधिकार के समान नहीं माना जा सकता।

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 या परिसीमन अधिनियम में आरक्षित सीटों के रोटेशन को अनिवार्य बनाने का प्रावधान नहीं है। ऐसे में अदालत अपनी ओर से कानून में रोटेशन की शर्त नहीं जोड़ सकती।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी संसद को बताया था जिम्मेदार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 लोकसभा तथा विधानसभा में SC-ST के लिए आरक्षित सीटों की संख्या का प्रावधान करते हैं। वहीं, निर्वाचन क्षेत्रों की पहचान करने की प्रक्रिया संसद के अधिकार क्षेत्र में आती है।

हाईकोर्ट ने माना था कि सामाजिक और राजनीतिक न्याय को आगे बढ़ाने के लिहाज से रोटेशन बेहतर व्यवस्था हो सकती है। इससे उन निर्वाचन क्षेत्रों में भी SC-ST समुदायों के उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने का अवसर मिल सकता है, जहां उनकी आबादी कम है।

हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया था कि ऐसी नीति लागू करना संसद का काम है। न्यायपालिका कानून में रोटेशन का प्रावधान जोड़ने का आदेश नहीं दे सकती। सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी रुख को बरकरार रखा।

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